उस दिन मेरी बाइक खराब हो गई थी। सुबह उठा तो स्टार्ट ही नहीं हुई। मैकेनिक ने कहा, “दो दिन लगेंगे।” मजबूरन ऑटो से ऑफिस जाना पड़ा। नोएडा से ग्रेटर नोएडा का सफर। डेढ़ घंटे की हवा-झोंका। पैसे भी काफी खर्च हो गए। और तनख्वाह अभी एक हफ्ते बाकी थी।
शाम को ऑटो में बैठा लौट रहा था। ड्राइवर बहुत बातूनी था। रेडियो चला रखा था। तभी उसका फोन बजा। उसने दूसरी तरफ किसी से कहा — “हाँ भाई, वो https://vavada.solutions/hi/ वाला ऐप खोल रखा है क्या? मैंने सोचा आज सौ लगाए थे, चार सौ मिल गए।”
मेरे कान खड़े हो गए। मैंने पूछा, “क्या बोले आप?”
उसने बताया कि वो छोटे-मोटे दांव लगाता है, कभी कुछ मिल जाता है, कभी नहीं। “पर मजा आता है, भाई साहब,” उसने कहा। उसकी बात सुनकर मैंने मन ही मन सोचा — इतना गरीब आदमी खेल रहा है, तो मैं क्यों नहीं? मैं तो ऑफिस में सीनियर हूँ।
घर पहुँचा। खाना खाया। फिर बिस्तर पर लेटकर लिंक खोला। साइट खुली तो बिल्कुल साफ-सुथरी लगी। नकलीपन नहीं था। मैंने एक गेम खेलना शुरू किया — कार्ड्स बेस्ड कुछ। नियम थोड़े जटिल थे, पर देखते-देखते समझ में आ गया।
मैंने केवल 50 रुपये डाले। सोचा — ऑटो का किराया बचा लूँगा तो ठीक। पहले दो राउंड हार गया। उसके बाद एक जीता — 70 रुपये। नेट में 20 रुपये का फायदा।बहुत छोटी बात थी, पर मुझे बचपन वाला एहसास हुआ — जब गुली-डंडा खेलते थे और एक रन बनता था।
मैंने उसी रात दोबारा 100 रुपये डाले। पता नहीं क्यों, पर दिल कह रहा था कि कुछ होने वाला है। रात के 11:30 थे। घर में सन्नाटा था। सिर्फ पंखे की आवाज़ और मेरे साँस लेने की आवाज़। मैंने तीसरा गेम शुरू किया। दांव छोटा था, पर दिमाग पूरा लगा रहा था।
और फिर — अचानक सब कुछ बदल गया।
स्क्रीन पर ‘बोनस राउंड’ लिखा आया। मेरे दिल ने एक अजीब सी छलांग लगाई। फिर अंक उछलने लगे। 150, 350, 800, 1200 — मैंने अपना मुँह खोल दिया। रुका नहीं, 2800, फिर 5400, और फिर सीधा 11,200 पर जाकर रुक गया।
मैंने ऑटो वाले भाई को याद किया। वो सही कह रहा था — कभी-कभी छोटा सा मौका बड़ा मौका बन जाता है।
मैंने तुरंत निकासी कर दी। प्रोसेस में कुछ घंटे लगे, पर अगली सुबह तक पैसे आ गए। उस दिन मैंने ऑटो वाले भाई को ढूंढा। नहीं मिला। दोबारा उसी रूट पर गया तो कोई दूसरा था। मैंने सोचा — चलो, नेकी का बदल लिखा हुआ है।
उन ग्यारह हजार में से मैंने अपनी बाइक ठीक करवाई। एक हजार रुपये से कम लगे। बचे हुए पैसों से मैंने एक नया हेलमेट खरीदा — अच्छा वाला, फुल फेस। पुराना हेलमेट तो चटक गया था। और बाकी बचत में डाल दिए।
एक अजीब बात हुई उसके बाद। हर दिन ऑफिस जाते समय मैं ऑटो वालों को ध्यान से देखता। उनकी थकान, उनकी जद्दोजहद। और मुझे लगता कि हम सब एक जैसे हैं। बस किसी को अपने काम से जीत मिलती है, किसी को ऐसे मौकों से।


